"भारत, हिमालय और इंदु सागर (हिन्द महासागर) के बीच स्थित वह भूमि जिसका इतिहास न जाने कितने साल पुराना है। पूरी दुनिया में हमारा एक मात्र ऐसा देश है जिसने इतनी विविधता और संस्कृतियों को स्थान दिया। एक समय हमारा देश हर एक क्षेत्र में समृद्ध और निपुण था, इस हद तक की यह अविश्वसनीय दिखाई पड़ता है - नृत्य, संगीत, वास्तुकला,अन्य कलाएं, और अनेक भाषाएं और वेशभूषाएं। लेकिन यह सारी कलाओं का एक बहुत गहरा संबंध इस देश के अनेकों आध्यात्मिक मार्गो से है। इतनी विविधता के बावजूद इस भौगोलिक स्थान को बाहर के लोगों के द्वारा एक देश के तरह देखा गया। इस देश के लोगों के अंदर परम सत्य और ज्ञान को जानने की आग ने उस आध्यात्मिक सूत्र को बनाया जिसमें हमे एकता मिली।
इतिहास और आर्थिक परिप्रेक्ष्य
लेकिन दुर्भाग्य से हमारे देश को कुछ ११०० सालों के आक्रमण, उपनिवेश और शोषण को झेलने पड़ा। यह आक्रमणकारी जहां भी गए उन्होंने यह निश्चित किया कि वहां के लोगों की पहचान को खत्म कर दिया जाए और वहां के लोग उनके तरीके से ही जिए। भारत में भी उन्होंने यही ढंग आजमाया और इससे हमारी संस्कृति को भी काफ़ी नुकसान पहुंचा। लेकिन हमारा आर्थिक शोषण सबसे प्रत्यक्ष था।
१७६५ से १९३८ तक अंग्रेजों के द्वारा भारत से लकभग $ ४५ ट्रिलियन लूटा गया। २०० वर्षों के अंग्रेजों के शासन ने भारत को दुनिया के सबसे अमीर देशों में से सबसे गरीब देशों में से एक बदल दिया। और १९४७ में जब वे भारत छोड़ कर गए तो एक गरीब, कुपोषित आबादी और विभाजन के दर्दनाक घाव दे कर गए।
इन सब के बावजूद १९४७ से २०२४ तक, इन ८८ वर्षों में हमने आर्थिक रूप से ज़्यादा तर देशों से बेहतर प्रदर्शन किया है। भारतीय अर्थव्यवस्था अब नाममात्र GDP के हिसाब से दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी और क्रय शक्ति समता (PPP) द्वारा तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है।
- १९५० में इसकी GDP $ ३०.६ बिलियन थी।
- २०१७ में भारत की GDP $ २.५४ बिलियन या $ ९.६९ ट्रिलियन (PPP के अनुसार) थी।
- इसके औद्योगिक क्षेत्र का सकल घरेलू उत्पाद में २९.०९% योगदान है और भारत को अब एक नव औद्योगीकृत देश के रूप में वर्गीकृत किया गया है।
आर्थिक असमानता और सामाजिक चुनौतियाँ
लेकिन इन सब आंकड़ों के पीछे अभी भी ऐसे कई लोग है जिनको खाना, स्वास्थ्य और शिक्षा की जरुरते पूरी नहीं हो पा रही है। भारतीय आबादी के शीर्ष १०% लोगों के पास कुल राष्ट्रीय संपत्ति का ७७% हिस्सा है।
२०१७ में उत्पन्न संपत्ति का ७३% सबसे अमीर १% के पास चला गया, जबकि ६७० मिलियन भारतीय, जो आबादी का सबसे गरीब आधा हिस्सा हैं, उनकी संपत्ति में केवल १% की वृद्धि देखी गई।
"भारत के मामले में विशेष रूप से चिंताजनक बात यह है कि एक ऐसे समाज में आर्थिक असमानता बढ़ रही है जो पहले से ही जाति, रिलिजन, क्षेत्र और लिंग के आधार पर विभाजित है।"
यह भेदभाव शायद आपको शहरों में कम दिखे, लेकिन गांवों में यह काफ़ी स्पष्ट है। और हमारा देश जहां पर ६५% जनसंख्या गांव में रहती है, भेदभाव को खत्म करना बहुत आवश्यक हो जाता है।
मिट्टी की सेहत और कृषि संकट
वह सभी चुनौतियां जो आज हमारे देश, और दुनिया, के सामने है उनमें से मिट्टी के खराब होने को रोकना सबसे महत्वपूर्ण है।
हमने अपरिस्थितिक कृषि पद्धतियों, वनों की कटाई और अन्य कारकों के द्वारा भूमि का कटाव इतना गंभीर कर दिया है कि भारत की मिट्टी का ६३% हिस्सा ०.५% से भी कम जैविक (ऑर्गेनिक) कार्बन की मौजूदगी के साथ गंभीर स्थिति में है।
"मिट्टी और जीवन साथ-साथ विकसित हुए है। मिट्टी के बिना जीवन नहीं है और जीवन के बिन मिट्टी नहीं।"
मनुष्यों के द्वारा खाएं जाने वाले भोजन का ९५% हिस्सा मिट्टी से आता है। और केवल खाद्य सुरक्षा ही नहीं बल्कि जैव विविधता की हानि, जल की कमी, जलवायु परिवर्तन, गरीबी - मिट्टी के स्वास्थय से घनिष्ट रूप से जुड़ी हुई है।
संस्कृति और पहचान का संरक्षण
एक ओर समस्यात्मक बिंदु है हमारा अपनी पहचान का संरक्षण पर तवज्जू न देना। अगर हम अपने समृद्ध इतिहास से अनभिज्ञ होंगे, तो हमें अपनी पहचान मालूम नहीं होगी और न ही उसपर गर्व होगा।
"जब भारत का वास्तविक इतिहास सामने आएगा, तब यह सिद्ध हो जाएगा कि धर्म और ललित कला दोनों में भारत संपूर्ण विश्व का आदिगुरु है।"
भारत के भविष्य की दिशा
एक देश का विकास सिर्फ़ उसका आर्थिक विकास होने से नहीं होता बल्कि तब होता है जब वहां के लोग विकसित और खुश हो। तभी वह देश हर एक क्षेत्र में अव्वल प्रदर्शन कर सकता है।
इसलिए आवश्यक है कि भारत का हर एक व्यक्ति जागरुक बने। जागरूकता जो किसी निर्धारित विषय से संबंधित नहीं बल्कि जीवन से हो।
युवाओं की भूमिका
भारत को जरूरत है जागरुक लोगों की जिनके पास फुर्तीला शरीर, स्थिर मन और तेज बुद्धि हो। भारत के युवा को जरूरत शिक्षा की और अन्वेषण करने की है।
तभी वह उस भारत के उदय के आदर्श का स्मरण करेंगे जिससे भारत को अपना वैभव वापस मिल सकता है।
"युवा जिनमें इतनी हिम्मत होगी कि वे अपना समय और ऊर्जा ज्यादा से ज्यादा हर किसी की भलाई में लगा पाएंगे, ऐसे प्रज्वलन युवा न ही सिर्फ भारत को नहीं लेकिन वसुधैव कुटुंबकम की भावना से पूरे विश्व को एकजुट करेंगे। इसी प्रकार भारत इस विश्व को समृद्धि के पथ पर अग्रसर करते हुए विश्व गुरु बनकर उभर के आ सकता है।"
Sources:
- Bha-ra-ta: The Rhythm of a Nation by Sadhguru
- OXFAM International_India: extreme inequality in numbers
- Hindustan Times_India at 70: The good and bad of India’s growth story
- PIB_Ministry of Finance_Economic Survey highlights thrust on rural development
- https://consciousplanet.org
- The Economics Times_British reduced India to one of the poorest countries: Shashi Tharoor
Akshat Bajpai
Currently pursuing BA in Humanities and Social Sciences (Economics) from Navrachana University, Vadodara